Thursday, September 27, 2018

飓风“哈维”留下的思考

两周前“哈维”飓风重创得克萨斯州,美国第四大城市休斯敦的人们经受了最严峻的考验。“哈维”的强度很高,美国国家气象局警告说:“此次天气事件前所未有,其影响是前所未知和前所未见的。”紧接着我们就看到一场打破所有记录的降水,如今“哈维”已经成为美国历史上最极端的降雨事件 。

尽管气候变化与“哈维”形成之间的关联不明,但其极端性却显然与气候变化关系密切。空气与海水温度的升高,再加上海平面上升都放大了飓风的威力和危险性。2015年,休斯敦市长安妮丝·帕克就警告说海平面上升将显著加大洪水带来的损失。

气候科学家朱丽叶·鲁尼-瓦尔加在接受《波士顿先驱报》的采访时,曾这样描述气候信号:“由于海洋暖化,它可以通过风暴转移更多能量。大气温度越高,就能从海洋吸收越多的水汽。我们如今在美国各地都能越来越多地听到‘创纪录的降水’或‘强降水’等词汇,而不仅仅是在此次风暴中。”

但问题也不仅仅在于更加猛烈的风暴,而在于我们如何管理城市环境。在风暴到来之前就已经有人发出警告:休斯敦松垮的城市规划方式和对城市“摊大饼”的纵容都增加了洪灾风险。

随着洪水退去,其所造成的巨大损害将逐渐显现。根据摩根大通的估计,投保的商家、住宅和车主申请理赔的总额可能高达200亿美元(1320亿元人民币) 。

但根据全球风险建模企业 的估计,此次“哈维”飓风引发的大风、风暴潮和内涝所导致的经济损失可能达到700-900亿美元(4620-5940亿元人民币)。这些数字之所以与上面的估计存在如此巨大的差异,是因为投保洪水险的人非常少。截至2016年8月,休斯敦所在的哈里斯县的160万人口中仅有15%投了洪水险,而位于洪水“高风险”地区的住宅投保率也只有28%。

那些没有投保的人可能只能依靠全国洪水保险计划( )。全国洪水保险计划是一项政府措施,旨在提供可以负担的洪水保险,以达到分担地方政府减灾行动的目的。不过,这个计划的实施效果并不令人满意,目前负债高达246亿美元(1620亿元)

更令人担心的是,该计划被那些遭受灾害重创的地区视为鼓励重建的工具。这些“重复性损失”的房产虽仅占所有投保房产数量的1%,其理赔额度但却占总额的20%-30%
。在自然资源保护协会考察的3万宗“重复性损失”财产中,75%都没有采取任何措施减轻未来的风险。

抱着改革该计划的目标,一些看似八杆子打不着的伙伴走到了一起。私营保险公司、环保团体、以及共和党和民主党的政客都要求对该计划进行改革。这些集团一致认为需要绘制更精确的洪水地图、采取激励措施降低风险并引入私营部门参与竞争。

但是,有效的改革势必会提高洪水频发地区人们的保险成本,无论对当地业主还是代表他们的政客来说,这都是一颗难以下咽的苦药。实际上,早在2012年该计划就进行过关键的改革,提高了很多投保人的保费,不过
很快在2014年遭到废除。本月底是这一计划再授权的最后期限,“哈维”飓风带来的巨大损失将让相关讨论更加紧迫。

无论如何,美国绸缪和应对洪水的方式都亟待改革。但我们看到了危险的信号,特朗普政府可能会让情况变得更糟。就在“哈维”来袭之前不久,联邦政府一纸政令撤销了洪水频发或易受海平面上升影响地区政府出资的基础设施项目的洪水风险标准。

美国国家环保局局长斯科特·普鲁特是特朗普政府一位有影响力的成员,当被问及“哈维”飓风与气候变化的关系时,他并未给出明确的答复 。在减缓和适应气候变化方面,特朗普政府一直无所作为或进行破坏,甚至从某些政府网站上撤掉关于气候变化的陈述和阐释。你叫不醒一个装睡的人,也很难让人对一件自己并不承认的事情做出规划。

随着海面上升和大气变暖,休斯敦如果要避免未来更大的损失,重建时就必须更加明智。但是,这个城市也是美国很多油气企业的总部所在地,它们制造出的温室气体排放是气候变化的罪魁祸首。因此,休斯敦的变化不能仅限于改善城市规划,而是要从著名的化石燃料中心向清洁能源城市转型。当然,这里也有积极的迹象——得克萨斯已经成为美国风能发电量最大的州。

“哈维”飓风带来的破坏是巨大的。但是,在这个政治碎片化日益严重的时代,普通民众对于风暴的反应是坚定的、团结的,且
常常是巧妙的。要应对即将到来的挑战,我们都需要这样的乐观态度。

Wednesday, September 19, 2018

中国将设立新的顶层环保机构

邓小平被中国人称为中国实施改革开放和经济建设的总设计师。如今看来,习近平似乎有意成为中国生态文明建设的总设计师。

10月19日 ,在中国共产党第十九次全国代表大会(以下简称十九大)上,中共中央总书记习近平发表长达三个半小时的报告,并在其中将建设生态文明称作是中华民族永续发展的千年大计。他感慨:“人类对大自然的伤害最终会伤及人类自身,这是无法抗拒的规律”。

这样感性的话语在中共最高规格的代表大会上并不多见,可见生态环境在习近平“建设美丽中国”蓝图中的特殊地位。不过相比这句带有哲理的感慨,更为引人瞩目的是习近平还提出,为了“加强对生态文明建设的总体设计和组织领导”,将要设立新的,负责管理全国所有“自然资源资产”产权的机构,以及负责监管全国“自然生态”的机构。

这意味着,新的中央机构将对分散在全国各地的矿藏、水流、森林、山岭、草原、荒地、海域、滩涂等各类自然资源统一行使所有权,负责全民所有自然资源的出让等。

生态文明建设为何需要新机构?

这并不是中共第一次产生设置顶层机构负责生态资产管理的想法。早在2015年9月发布的《生态文明体制改革总体方案》就提出设立新机构来监管自然资源资产。

这一举措之所以必要,是因为中国在资源、环境、生态方面有很多部门进行管理,有时缺乏对资源的统一考虑,从各自的领域出台很多具体的规定,反而出现混乱局面。

生态文明体制建设的亲历者和参与者、中央财经领导小组办公室副主任杨伟民此前告诉媒体,生态环境领域的改革,相对于其他方面的改革总体上滞后。其中一个原因,就是因为缺乏一个顶层设计。但环境污染的严重性等问题迫切需要对生态文明建设做出一个顶层设计。

利益冲突如何避免?

值得注意的是,中国的土地所有权分为全民所有和集体所有,而构建生态文明直接面临的问题之一就是,国家想要严格保护的土地中有一部分事实上属于集体,而非全民,这意味着国家可能需要与集体进行土地(和资源)的所有权置换。

这一局面在正在进行的国家公园试点中已经体现出来。中央政府的计划是,通过租赁、置换等方式,将国家公园内的集体产权土地转变为国有产权,再由专门机构管理。

但有意见认为,这样做可能导致地方把最好的资源划给中央后,却没有任何直接的补偿和收益,必然会增加中央与地方的矛盾。尽管方案专门提出强化生态补偿机制,但谁会是这种补偿的受益者,目前并不明确。

设立专门的机构管理全国所有自然资源资产,就是为了保障产权重新划定顺利完成。目前,这一改革已经在各国家公园试点项目内进行。国家林业局局长张建龙表示,2018年将完成试点区80%以上国有自然资源确权登记。

据新华社透露,2016年12月底中共中央就下定决心整顿全国自然资源的管理。在中央全面深化改革领导小组的会议上,一份《关于健全国家自然资源资产管理体制试点方案》提出,自然资源的所有者和管理者要分开,并且一个部门只能管理一件事。

这两大原则意味着目前的自然资源管理部门(如林业局、海洋局)将不再同时行使资产所有权,而需要专门设立一个新机构行使所有权。而这个机构同样不负责其他职能,如生态环境保护监管,而要再新设一个独立的新机构专门负责。

不过目前“设立国有自然资源资产管理和自然生态监管机构”的表述并不具体,还存在很大想像空间。根据中科院可持续发展战略研究组2015年的一份关于生态管理体制改革的报告,究竟是成立专门的自然资源资产管理委员会和监管委员会,还是在自然资源管理部门下设相对独立的自然资源资产管理局和监管局,中共中央尚未形成共识。

但据业内人士分析,无论如何,十九大之后中国将开展涉及多部门的多项职责调整,几年以来广受关注的部委改革将逐渐浮出水面。

“出台生态文明体制改革总体方案,目的就是要整合统一。” 杨伟民说。而整合统一,就需要对一些机构职责做出调整,“这会触及某些部门的奶酪”。

Monday, September 3, 2018

अटल बिहारी वाजपेयी की भाषण कला: हंसाते भी थे, भावनाओं में बहाते भी थे

पाध्याय जौनपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे.
उस समय चार उपचुनाव हो रहे थे. वडोदरा से मीनू मसानी चुनाव लड़ रहे थे, अमरोहा से जेबी कृपलानी और फर्रुखाबाद से डॉ. राम मनोहर लोहिया चुनावी मैदान में थे.
जौनपुर की सभा में मैंने वाजपेयी को पहली बार सुना. मैंने यह महसूस किया कि वाजपेयी लोगों को अपनी सभा में हंसाते भी हैं और भावनाओं में बहा भी देते हैं.
यही उनके भाषण की अद्भुत कला थी और उन्हें यह कला अपने पिता से मिली थी. इसके लिए उन्हें कोई ख़ास मशक्कत नहीं करनी पड़ी. वाजपेयी के भाषण में हास्य, विनोद और मुद्दे की बात हुआ करती थी.
वाजपेयी बिना किसी पर्ची के बोलते थे और मुद्दों को सही समय पर सटीक तरीके से रखते थे. उनकी सभा में हर विचारधारा के लोग उन्हें सुनने आते थे.
अटल बिहारी के व्यक्तित्व का प्रभाव ही था वो हारी हुई बाजी भी जीत लेते थे. वो जहां भी चुनावों के दौरान जाते थे, वहां समर्थन का ग्राफ़ उनके भाषण के बाद बढ़ जाता था.कसभा में चाहे अयोध्या का मामला हुआ या फिर अविश्वास प्रस्ताव का मामला, पूरा संसद उन्हें ध्यान से सुनता था.
विपक्षी सांसद उन्हें इसलिए भी सुनते थे क्योंकि वो भारतीय जनता पार्टी के होते हुए भी कई बार ऐसी बात भी करते थे जो राष्ट्रहित में होती थी और पार्टी लाईन से बाहर होती थी.
यही कारण है कि उन्हें किसी ख़ास पार्टी का नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेता माना जाता था.
अयोध्या मामले के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में जो भाषण दिया, वो शायद अटल बिहारी वाजपेयी ही दे सकते थे. उन्होंने कहा था कि जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को ढहाने में हिस्सा लिया है उन्हें सामने आना चाहिए और ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.
ये एक ऐसी बात थी जो भाजपा का दूसरा नेता नहीं कह पाता और इस बात को उन्होंने दबी जबान से नहीं कहा था.
वो लोकसभा में अपने भाषणों में कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसे दूसरे समझ नहीं पाते थे.
एक बार सीपीआई के कुछ नेता लोकसभा में उनका विरोध कर रहे थे. बोलने के दौरान वे उन्हें टोक रहे थे, तो उन्होंने कहा कि जो मित्र हमारे भाषण के दौरान टोक रहे हैं वो शाखामृग की भूमिका में हैं.
अब शाखामृग का मतलब किसी को समझ नहीं आया. थोड़ी देर बाद प्रकाश वीर शास्त्री ने बताया कि शाखामृग का मतलब होता है बंदर. इसके बाद विपक्षी भड़क गए.
उनके भाषण का विषय कितना भी नीरस होता था, वो उन्हें रोचक बना देते थे और हंसते-हंसाते लोगों को समझा देते थे.
विषय अगर पेचीदा होता तो वे मुहावरों और कहावतों के ज़रिए उसे सरल बना देते थे कि सुनने वाले को भी लगता था कि वो कोई नई बात कह रहे हैं. पहली बार अटल चुनाव जीत कर संसद आए थे. उस समय जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. वो नए सांसदों को बोलने का मौका देते थे और उन्हें गौर से सुनते भी थे.
जब उन्होंने पहली बार वाजपेयी का भाषण सुना, वो काफ़ी प्रभावित हुए. यह सब जानते हैं कि पंडित नेहरू ने उन्हें देश का भावी प्रधानमंत्री बताया था.
बतौर सांसद उन्होंने दो बातों पर ज़ोर दिया था. पहला वो संसद में संसदीय मर्यादाओं का पालन करते हुए बोलते थे. दूसरा आचरण.
यही कारण है कि उनके राजनीति काल में कभी कोई ऐसा मौका नहीं आया कि उनके बातों पर किसी ने आपत्ति जताई हो या हंगामा हुआ हो.
समकालीन नेताओं में बतौर वक्ता वो अलग स्थान रखते थे. तब जनसंघ में कुछ बेहतरीन वक्ता थे, जैसे जगन्नाथ राव जोशी, प्रकाश वीर शास्त्री. लेकिन जनता को मोह लेने की कला तो अटल बिहारी वाजपेयी के पास ही थी.
1980 में जब भाजपा का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन मुंबई में हो रहा था और मंच पर एमसी छागला थे. उन्होंने अधिवेशन के बाद दो बातें कहीं. पहला कि वो भाजपा में कांग्रेस का विकल्प देख रहे हैं और दूसरा कि अटल बिहारी वाजपेयी में प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं.में एक सभा में उन्होंने कहा था कि इंदिरा गांधी आज कल मेरी तुलना हिटलर से करती हैं. एक दिन उन्होंने इंदिराजी से पूछा कि वो उनकी तुलना हिटलर से क्यों करती हैं.
तो इंदिरा गांधी ने जवाब दिया कि आप बांह उठा उठाकर सभाओं में बोलते हैं, इसलिए मैं आपकी तुलना नाजी से करती हूं.
इस पर वाजपेयी जी ने टिप्पणी की और लोगों ने खूब ठहाका लगाया. उन्होंने कहा कि क्या मैं आपकी तरह पैर उठा उठाकर भाषण दूं.
ये उनके व्यंग्य का तरीका था. इस तरह के व्यंग उनके भाषण को रोचक बनाता था. उनके भाषण में रोचकता के साथ-साथ गंभीर मुद्दे होते थे, चिंताएं होती थी, जो किसी भी राष्ट्रीय नेता के भाषण में होना चाहिए.