पाध्याय जौनपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे.
उस
समय चार उपचुनाव हो रहे थे. वडोदरा से मीनू मसानी चुनाव लड़ रहे थे,
अमरोहा से जेबी कृपलानी और फर्रुखाबाद से डॉ. राम मनोहर लोहिया चुनावी
मैदान में थे.
जौनपुर की सभा में मैंने वाजपेयी को पहली बार सुना.
मैंने यह महसूस किया कि वाजपेयी लोगों को अपनी सभा में हंसाते भी हैं और
भावनाओं में बहा भी देते हैं.
यही उनके भाषण की अद्भुत कला थी और
उन्हें यह कला अपने पिता से मिली थी. इसके लिए उन्हें कोई ख़ास मशक्कत नहीं
करनी पड़ी. वाजपेयी के भाषण में हास्य, विनोद और मुद्दे की बात हुआ करती
थी.
वाजपेयी बिना किसी पर्ची के बोलते थे और मुद्दों को सही समय पर सटीक
तरीके से रखते थे. उनकी सभा में हर विचारधारा के लोग उन्हें सुनने आते थे.
अटल बिहारी के व्यक्तित्व का प्रभाव ही था वो हारी हुई बाजी भी जीत लेते
थे. वो जहां भी चुनावों के दौरान जाते थे, वहां समर्थन का ग्राफ़ उनके
भाषण के बाद बढ़ जाता था.कसभा में चाहे अयोध्या का मामला हुआ या फिर अविश्वास प्रस्ताव का मामला, पूरा संसद उन्हें ध्यान से सुनता था.
विपक्षी
सांसद उन्हें इसलिए भी सुनते थे क्योंकि वो भारतीय जनता पार्टी के होते
हुए भी कई बार ऐसी बात भी करते थे जो राष्ट्रहित में होती थी और पार्टी
लाईन से बाहर होती थी.
यही कारण है कि उन्हें किसी ख़ास पार्टी का नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेता माना जाता था.
अयोध्या
मामले के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में जो भाषण दिया, वो शायद अटल
बिहारी वाजपेयी ही दे सकते थे. उन्होंने कहा था कि जिन लोगों ने बाबरी
मस्जिद को ढहाने में हिस्सा लिया है उन्हें सामने आना चाहिए और ज़िम्मेदारी
लेनी चाहिए.
ये एक ऐसी बात थी जो भाजपा का दूसरा नेता नहीं कह पाता और इस बात को उन्होंने दबी जबान से नहीं कहा था.
वो लोकसभा में अपने भाषणों में कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसे दूसरे समझ नहीं पाते थे.
एक
बार सीपीआई के कुछ नेता लोकसभा में उनका विरोध कर रहे थे. बोलने के दौरान
वे उन्हें टोक रहे थे, तो उन्होंने कहा कि जो मित्र हमारे भाषण के दौरान
टोक रहे हैं वो शाखामृग की भूमिका में हैं.
अब शाखामृग का मतलब किसी
को समझ नहीं आया. थोड़ी देर बाद प्रकाश वीर शास्त्री ने बताया कि शाखामृग
का मतलब होता है बंदर. इसके बाद विपक्षी भड़क गए.
उनके भाषण का विषय कितना भी नीरस होता था, वो उन्हें रोचक बना देते थे और हंसते-हंसाते लोगों को समझा देते थे.
विषय
अगर पेचीदा होता तो वे मुहावरों और कहावतों के ज़रिए उसे सरल बना देते थे
कि सुनने वाले को भी लगता था कि वो कोई नई बात कह रहे हैं. पहली बार अटल चुनाव जीत कर संसद आए थे. उस समय जवाहरलाल नेहरू
प्रधानमंत्री थे. वो नए सांसदों को बोलने का मौका देते थे और उन्हें गौर से
सुनते भी थे.
जब उन्होंने पहली बार वाजपेयी का भाषण सुना, वो काफ़ी
प्रभावित हुए. यह सब जानते हैं कि पंडित नेहरू ने उन्हें देश का भावी
प्रधानमंत्री बताया था.
बतौर सांसद उन्होंने दो बातों पर ज़ोर दिया था. पहला वो संसद में संसदीय मर्यादाओं का पालन करते हुए बोलते थे. दूसरा आचरण.
यही कारण है कि उनके राजनीति काल में कभी कोई ऐसा मौका नहीं आया कि उनके बातों पर किसी ने आपत्ति जताई हो या हंगामा हुआ हो.
समकालीन नेताओं में बतौर वक्ता वो अलग स्थान रखते थे. तब जनसंघ में कुछ
बेहतरीन वक्ता थे, जैसे जगन्नाथ राव जोशी, प्रकाश वीर शास्त्री. लेकिन जनता
को मोह लेने की कला तो अटल बिहारी वाजपेयी के पास ही थी.
1980 में
जब भाजपा का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन मुंबई में हो रहा था और मंच पर एमसी
छागला थे. उन्होंने अधिवेशन के बाद दो बातें कहीं. पहला कि वो भाजपा में
कांग्रेस का विकल्प देख रहे हैं और दूसरा कि अटल बिहारी वाजपेयी में
प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं.में एक सभा में उन्होंने कहा था कि इंदिरा गांधी आज कल मेरी तुलना हिटलर
से करती हैं. एक दिन उन्होंने इंदिराजी से पूछा कि वो उनकी तुलना हिटलर से
क्यों करती हैं.
तो इंदिरा गांधी ने जवाब दिया कि आप बांह उठा उठाकर सभाओं में बोलते हैं, इसलिए मैं आपकी तुलना नाजी से करती हूं.
इस पर वाजपेयी जी ने टिप्पणी की और लोगों ने खूब ठहाका लगाया. उन्होंने कहा कि क्या मैं आपकी तरह पैर उठा उठाकर भाषण दूं.
ये
उनके व्यंग्य का तरीका था. इस तरह के व्यंग उनके भाषण को रोचक बनाता था.
उनके भाषण में रोचकता के साथ-साथ गंभीर मुद्दे होते थे, चिंताएं होती थी, जो किसी भी राष्ट्रीय नेता के भाषण में होना चाहिए.
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